कहानी- जन्मकुंडली

कहानी- जन्मकुंडली

अभी-अभी डाकिया कार्ड दे गया है. कार्ड क्या है, एक निमंत्रण पत्र है- हमारी शादी की पचासवीं वर्षगांठ का निमंत्रण पत्र, जो हमारे बच्चे विदेश से आकर मनानेवाले हैं. इस बात का पता तो हमें अभी-अभी इस कार्ड को पढ़कर चला है. वैसे हम दोनों का प्रोग्राम तो गुपचुप तरी़के से पचासवीं वर्षगांठ मनाने का था. लेकिन बच्चे कहां चूकनेवाले थे. अंश ने तो अमेरिका में बैठे-बैठे ही अपने मित्र सुशांत के ज़रिए सब व्यवस्था कर ली है. छोटा बेटा सांध्य भी तो विदेश में ही है. दोनों भाइयों ने अपनी बहन अंकिता के साथ मिलकर गोपनीय तरी़के से ये पूरा प्लान बनाया है.
अभी-अभी अंश का फ़ोन आया था. उसने सभी कार्यक्रमों के बारे में बताया. सुबह हवन घर पर और शाम को शेष प्रोग्राम उसके दोस्त के फार्म हाउस पर होंगे. पहले सांस्कृतिक संध्या एवं बाद में भोज. उसने बताया कि सब रिश्तेदारों के ठहरने की व्यवस्था भी हो चुकी है. हम दोनों के मित्रों के लिए पचास कार्ड वह भिजवा रहा है. जल्द ही वे सब भी भारत पहुंच रहे हैं.
हम दोनों की ख़ुशी का कोई पारावार न था. मैं कार्ड हाथ में लिए ही अपने अतीत की जीवनयात्रा का विवेचन करने लगी. आज से सत्तर-बहत्तर वर्ष पूर्व लड़की का जन्म बहुत प्रसन्नता का विषय नहीं हुआ करता था. चूंकि मेरा जन्म तीन भाइयों के बाद हुआ था, इसलिए हमारे परिवार के लिए मेरा जन्म किसी लड़के के जन्म के समान ही प्रसन्नता का कारक था. मेरे जन्म पर भी ख़ूूब धूमधाम से सभी आयोजन हुए. मेरे पापा की कोई बहन नहीं थी, इसलिए दादी का उत्साह देखते बनता था. बड़े उत्साह से उन्होंने मेरा नामकरण संस्कार करवाया. पंडित से जन्मपत्री भी बनवाई. अब पंडित ने जन्मपत्री में पता नहीं क्या लिखा कि उसे पढ़कर सबके चेहरे मुरझा गए. दादी तो विशेष चिंतित नज़र आ रही थी.
अब आप भी तो जानना चाहेंगे कि जन्मकुंडली में ऐसा क्या लिखा था, जो सबका उत्साह ठंडा पड़ गया? मुझे तो बाद में थोड़ा बड़े होेने पर पता लगा. दादी प्रायः ही बड़बड़ाती रहती थी, "लड़की कैसा खोटा भाग्य लेकर जन्मी है. न भाग्य में पढ़ाई-लिखाई है, न ही सुख-सौभाग्य. क्या होगा मेरी बच्ची का?"
उस समय तो ये सब मुझे ख़ास समझ में नहीं आता था, लेकिन मैं जल्द ही जान गई कि पंडित के कथनानुसार मेरी क़िस्मत में उच्च शिक्षा का योग नहीं है. मां और दादी प्रायः बातें किया करती थीं कि पंडित ने यह भी बताया है कि मेरे भाग्य में लड़कों की मां बनने का योग नहीं है और न ही पति का लंबा साथ मुझे मिल पाएगा.
तीनों भविष्यवाणियां मेरे अभिभावकों को परेशान करने के लिए पर्याप्त थीं. जहां तक मेरा प्रश्‍न है, उस समय तो मुझे अपनी पढ़ाई के विषय में कही गई भविष्यवाणी चुनौती की तरह लगी. मैंने ख़ुद को पढ़ाई में लगा दिया. विशेष रूप से अंग्रेज़ी विषय पर अधिक ध्यान दिया. परिणामस्वरूप मैं हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान लाती. अंततः अंग्रेज़ी साहित्य से मैंने एमए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया. मेरी इच्छा तो पीएचडी करने की थी, लेकिन सत्तर वर्ष पूर्व लड़की का इतना पढ़ना पर्याप्त था. मेरे माता-पिता मेरे विवाह की योजना बनाने लगे थे. जल्द ही उन्हें सफलता भी मिल गई.
यदि मैं अपनी इच्छा कहूं, तो मेरा विवाह करने का ज़रा भी मन नहीं था. मैं आत्मनिर्भर बनना चाहती थी. पंडित की कही बातें मेरे मन में सदा परेशानी का कारण बनी रहती थीं. यदि पंडित की बातें सही हुईं तो? यही प्रश्‍न राक्षस की तरह सदा मेरा पीछा करता रहता. लेकिन उस ज़माने में लड़की का मुंह खोलना विद्रोह माना जाता था. अतः मैंने भी अपने माता-पिता की इच्छा के सामने अपना सिर झुका दिया.
अपने आंचल में पंडित की भविष्यवाणी का डर छुपाए ससुराल की दहलीज़ पर क़दम रखा. ससुराल आकर कुछ दिनों के लिए तो सब कुछ भूल-सी गई. इनके परिवार ने मुझे भरपूर प्यार दिया. इन्होंने भी अपने प्यार में कभी कोई कमी न आने दी. चारों तरफ़ इतना प्यार व सम्मान होेते हुए भी मेरे मन में हमेशा डर-सा समाया रहता, 'कहीं पंडित की बातें सच निकलीं तो? इनके बिना मेरा क्या होगा?'
बच्चों के विषय में कहीं कोई दुराग्रह नहीं था. हम दोनों के लिए ही लड़के-लड़की में कोई अंतर नहीं था. लड़की का स्वागत भी हम वैसे ही करेंगे, जैसे लड़के का करते. इस तरह चार वर्ष बीत गए. पहले अंश का जन्म, तीन वर्ष बाद सांध्य का आना हमारे जीवन की मधुर स्मृतियों की तरह है. अंकिता इन दोनों से छोटी है. उसके जन्म पर जो सुखानुभूति हम दोनों को हुई, उसका अनुभव आज भी हम महसूस करते हैं.
अभी तक दो भविष्यवाणियां मिथ्या साबित हो चुकी थीं. मेरा विवेक इस बात की अनुमति नहीं देता था कि डरने का अब कोई कारण है. लेकिन मेरा मन अब भी इनके अनिष्ट की आशंका से भयभीत रहता. कई बार कल्पना में मैं इनकी मृत्यु से साक्षात्कार कर चुकी थी. ऑफ़िस से आने में इनको ज़रा भी देर हो जाती तो मुझे लगता, 'इनका अवश्य ही एक्सिडेंट हो गया होगा.' ये जब तक लौट न आते, तब तक ऐसे ही उल्टा-पुल्टा सोचती रहती.
जैसे-जैसे हम दोनों पति-पत्नी में प्यार बढ़ता जा रहा था, त्यों-त्यों मेरा डर भी बढ़ रहा था. मेरा मनोबल टूटने लगा था. मैं कहीं मानसिक रोगी न हो जाऊं, यह आशंका भी मुझे घेरने लगी थी. मैं अकेले ही सब सह रही थी.
मुझे प्रायः डरावने सपने आते- इनकी निर्जीव देह जमीन पर पड़ी है. मैं स़फेद साड़ी में श्रीहीन-सी बच्चों की उंगली पकड़े इधर-उधर भटक रही हूं. रहने-खाने तक का कोई ठिकाना नहीं है. क्या करूं, कहां जाऊं? कुछ समझ नहीं पा रही हूं. मैं ज़ोर से चीख पड़ती. ये मेरा कंधा पकड़कर हिलाते. मैं जाग जाती. ये बार-बार पूछते, "क्या कोई डरावना सपना देखा है." 'हां' कहकर मैं इन्हें आश्‍वस्त तो कर देती, लेकिन फिर सारी रात मैं सो नहीं पाती. इनसे भी तो कुछ बता नहीं पा रही. भविष्यवाणी वाली बात इन्हें बताकर मैं इनकी नज़र में उपहास का पात्र नहीं बनना चाहती थी.
इसी तरह डरते-डराते जीवन कट रहा था. बच्चे बड़े हो रहे थे. अंकिता का विवाह हुआ. अंश एवं सांध्य पहले नौकरी के कारण एवं बाद में विवाह करके अमेरिका व दुबई जा बसे. प्रत्यक्ष रूप से तो सब ठीक ही चल रहा था, लेकिन उस मन पर कहां नियंत्रण था, जो हर समय डरा-सहमा रहता.
बच्चों के जाने के बाद तो मैं और भी अधिक असुरक्षित महसूस करने लगी. "यदि इन्हें कुछ हो गया तो सब कैसे संभालूंगी?" बचपन से मन में बैठा डर का दानव मुझे तिल-तिल कर खाए जा रहा था.
इनके रिटायरमेंट का समय पास आ रहा था. इतनी आयु तक साथ रहने के कारण मेरी धारणा बदलने लगी थी. सोचती, 'जीवन और मृत्यु जीवन का शाश्‍वत् सत्य है, उसके लिए क्या डरना.' मेरे जीवन में पंडित की बताई दो बातें तो पहले ही निर्मूल साबित हो चुकी थीं. तीसरी बात भी ग़लत होगी, यह बात मेरे अंदर दृढ़ता से जड़ जमा रही थी. जन्मपत्री आदि का जीवन में कुछ भी महत्व नहीं है, यह विचार मुझे संबल प्रदान कर रहा था.
ऐसा नहीं है कि मेरे ससुराल में जन्मपत्री आदि को न मानते हों.
मेरी सास ने मेरे तीनों बच्चों की जन्मकुंडलियां बनवाई थीं, लेकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हुई उन्हें आज तक खोलकर पढ़ने की. मैं अपने बच्चों के विषय में कोई संशय अपने मन में नहीं पालना चाहती थी. प्राकृतिक रूप से मेरे बच्चों का मानसिक विकास हो, यही भाव सदा मेरे मन में रहा. मेरे पति ने सदा ही मेरा साथ दिया, क्योंकि उन्हें भी इन सब कर्मकांडों में विश्‍वास नहीं था.
कितनी देर मैं अपने अतीत में खोई रही, मुझे इसका एहसास तब हुआ, जब इन्होंने मेरा हाथ पकड़कर हिलाया, "गायत्री, कहां खो गई हो? बच्चों के आने में केवल सात दिन बचे हैं. उनके स्वागत की तैयारी करो. वह हमारी शादी की स्वर्णजयंती मनाने सात समंदर पार से आ रहे हैं. हमें भी अपनी तरफ़ से कोई कमी नहीं छोड़नी है. उन सब के लिए उपहार भी लाने हैं. हां गायत्री, यह ध्यान रखना कि दोनों बहुओं के उपहार भी अंकिता के उपहार के समान ही होने चाहिए."
"आप चिंता न करें, मैंने क्या कभी बेटी और बहुओं में अंतर किया है, जो इस बार करूंगी? मैंने तो दामाद के समान ही बेटों के लिए भी उपहार लाने की योजना बना रखी है."
निश्‍चित तारीख़ को हमारी शादी की वर्षगांठ बड़ी धूमधाम से मनाई गई. सारे आयोजन बच्चों ने बड़े ही भव्य तरी़के से मनाए. सांस्कृतिक संध्या बहुत ही कलात्मक रही. राम-सीता के स्वयंवर का मंचन मंजे हुए कलाकारों द्वारा किया गया. बच्चों ने भावुकता भरी कविताओं द्वारा हमारे प्रति प्यार व सम्मान का सुंदर प्रदर्शन किया. कुल मिलाकर बहुत ही आनंद आया. हमें ढेरों उपहार भी मिले.
बच्चों की छुट्टियां समाप्त हुईं. उनके लौटने का समय आ गया. वर्षों बाद हमारा सारा परिवार इकट्ठा हुआ था, वरना तीनों बच्चे तीन देशों में जा बसे हैं. सब के साथ हम दोनों ने भी ख़ूब मौज-मस्ती की.
मेरे मन में बार-बार यह विचार उठ रहा है कि बच्चों के लौटने से पहले अपने जीवन की उस भयानक भविष्यवाणी के विषय में बता दूं, जो पंडित ने मेरे जन्म पर की थी. जिस भविष्यवाणी ने मेरे जीवन का सुख-चैन मुझसे छीन रखा था. उन्हें यह भी बता दूं कि जन्मपत्री आदि में लिखी भविष्यवाणियां किसी भी बच्चे का भाग्य बना या बिगाड़ नहीं सकतीं. भाग्य तो बच्चा जन्म के समय ही ईश्‍वर के हाथों लिखाकर लाता है. उसी के अनुसार उसे सारा जीवन जीना होता है. जिस कार्य को सोचकर भगवान उसे पृथ्वी पर भेजते हैं, वह उसे पूरा करना ही होता है. मुख्य बात अगर कुछ है तो मनुष्य का पुरुषार्थ है, जो भाग्य को बनाता है. तुम लोग कभी भी इन अंधविश्‍वासों में मत पड़ना.
दूसरी तरफ़ मुझे लगता है कि बच्चों को कुछ भी बताना ठीक नहीं होगा. जो बीत गया, सो बीत गया. उन्हें अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने दूं. शायद यही उचित होगा.
बच्चे चले गए. पहुंचकर फ़ोन भी आ गया. पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है मैंने कितनी मूर्खता भरी सोच के साथ जीवन जीया. आज हम दोनों का सुखी दांपत्य जीवन है. छोटी-मोटी परेशानियों को छोड़ दें, तो सारा जीवन सुखमय रहा. सम्मान करनेवाले बच्चे, प्यार करनेवाला पति और हम दोनों का भरपूर साथ.
मैं अपना भी दोष नहीं मानती. बचपन से दिल की गहराई तक बैठी पंडित की भविष्यवाणी मुझे बार-बार व्याकुल करती रही. ज्योतिष शास्त्र एक अच्छा शास्त्र है, लेकिन अल्पज्ञानी पंडित के हाथ में जाकर वह अर्थ का अनर्थ कर सकता है. इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मैं हूं.
Written by- मृदुला गुप्ता





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